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By Karan Singh Bisht
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Updated on 24 Jul 2026, 12:17 IST
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अभ्यास
रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

JEE

NEET

Foundation JEE

Foundation NEET

CBSE
1. “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
(क) आदर और सम्मान
(ख) भक्ति और श्रद्धा
(ग) भय और शिष्टाचार

(घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर: (ग) भय और शिष्टाचार
तर्क: परशुराम के अत्यंत क्रोधित और भयानक रूप को देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा डर गए थे। वे अपनी जान बचाने और शिष्टाचार दिखाने के लिए अपने पिता के नाम के साथ अपना परिचय देते हुए दंडवत प्रणाम करने लगे। इससे स्पष्ट होता है कि वे भयभीत थे और परशुराम का सम्मान करके उनका क्रोध शांत करना चाहते थे।
2. “जनक बहोरि आइ सिर नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
(क) संवेदनशीलता
(ख) शिष्टता
(ग) सहनशीलता
(घ) उदासीनता
उत्तर: (ख) शिष्टता
तर्क: राजा जनक एक विनम्र और आदर्श राजा थे। परशुराम के आने पर उन्होंने झुककर प्रणाम किया और सीता से भी प्रणाम करवाया। इससे उनका अतिथि-सत्कार, विनम्रता और शिष्ट व्यवहार प्रकट होता है।
3. “अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
(ग) शिव-धनुष का खंडित होना
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
उत्तर: (ग) शिव-धनुष का खंडित होना
तर्क: परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। शिव-धनुष के टूटने को उन्होंने अपने आराध्य का अपमान माना। इसी कारण वे बहुत क्रोधित हो गए और राजा जनक से धनुष तोड़ने वाले व्यक्ति को सामने लाने के लिए कठोर शब्द कहने लगे।
4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) कूटनीति और चतुराई
(ख) विनम्रता और मर्यादा
(ग) त्याग और समर्पण
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
उत्तर: (ख) विनम्रता और मर्यादा
तर्क: परशुराम के अत्यंत क्रोधित होने पर भी श्रीराम ने उत्तेजित होकर उत्तर नहीं दिया। उन्होंने बहुत कोमल और विनम्र शब्दों में कहा कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। यह उत्तर श्रीराम की विनम्रता, मर्यादा और संयम को प्रकट करता है।
5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
उत्तर: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
तर्क: लक्ष्मण स्वभाव से वीर और निडर थे। परशुराम जब अपनी शक्ति का वर्णन करके सभा को डराने लगे, तो लक्ष्मण ने मुसकराकर उन पर व्यंग्य किया। उन्होंने बचपन में तोड़ी गई धनुहियों का उदाहरण देकर परशुराम के अहंकार को चुनौती दी। इससे पता चलता है कि लक्ष्मण उनके क्रोध से डरने वाले नहीं थे।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
1. “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर: इस पंक्ति का अर्थ है कि आधा पल भी एक कल्प के समान लंबा और भारी लग रहा था। यह पंक्ति सीता जी के संदर्भ में कही गई है।
शिव-धनुष टूटने के बाद जब परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर सभा में आए और सभी को धमकाने लगे, तो सीता जी अपने विवाह और भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हो गईं। उन्हें डर था कि कहीं परशुराम का क्रोध इस मंगल कार्य में बाधा न डाल दे। इसी चिंता और भय के कारण उन्हें समय बहुत धीरे-धीरे बीतता हुआ लग रहा था।
2. “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर: परशुराम की इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राजाओं पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा होगा। उन्होंने कहा कि जिसने धनुष तोड़ा है, वह समाज से अलग हो जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे। इस चेतावनी से पूरी सभा में भय और आतंक फैल गया।
तर्क:
3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: मेरी दृष्टि में परशुराम जैसे क्रोधी व्यक्ति को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग अधिक उचित और व्यावहारिक है।
कारण और तर्क:
4. ‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीर॥’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
उत्तर: यह पंक्ति श्रीराम की समदर्शिता, धैर्य और स्थिरचित्तता को दर्शाती है। वे न तो धनुष तोड़ने की सफलता पर अत्यधिक प्रसन्न हुए और न ही परशुराम के क्रोध से भयभीत या दुखी हुए।
अन्य पात्रों से भिन्नता:
इन सबके विपरीत श्रीराम पूरी परिस्थिति में शांत, संतुलित और मर्यादित बने रहे। वे सही समय पर नपे-तुले शब्दों में अपनी बात रखते हैं। यही भावनात्मक संतुलन उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के रूप में स्थापित करता है।
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए—
1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: मैं जनक की सभा में उपस्थित उन राजाओं में से एक था, जो शिव-धनुष को हिला तक नहीं सके थे। जैसे ही श्रीराम ने उस विशाल धनुष को तोड़ा, उसकी भयंकर टंकार सुनकर परशुराम जी वहाँ आ पहुँचे। उनका भयानक रूप, कंधे पर रखा फरसा और क्रोध से भरा चेहरा देखकर हम सभी राजा डर से काँप उठे।
डर के कारण मैंने अपने पिता का नाम लेकर उन्हें दंडवत प्रणाम किया, ताकि उनके क्रोध से बच सकूँ। जब परशुराम ने टूटे हुए धनुष को देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए और राजा जनक को कठोर शब्दों में धमकाने लगे। पूरी सभा में सन्नाटा छा गया था।
तभी लक्ष्मण मुसकराते हुए उनसे व्यंग्यपूर्ण बातें करने लगे। इससे परशुराम का क्रोध और भड़क गया। हम सब डर रहे थे कि अब कोई बड़ा अनर्थ न हो जाए। अंत में श्रीराम ने अपनी शांत, विनम्र और मधुर वाणी से परशुराम का मान रखा। विश्वामित्र जी के समझाने और श्रीराम की शक्ति को पहचानने के बाद परशुराम का क्रोध शांत हुआ। फिर वे तपस्या के लिए वन की ओर चले गए और हम सबने राहत की साँस ली।
2. “अति डर उतर देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे? (संकेत— सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
उत्तर: जब परशुराम जी के क्रोध के सामने राजा जनक डर के कारण उत्तर नहीं दे पा रहे थे, तब सभा में उपस्थित कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे।
इसके मुख्य कारण हो सकते हैं:
यह प्रसंग मनुष्य के व्यवहार की इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि कुछ लोग अपनी असफलता भूलकर दूसरों की कठिनाई देखकर प्रसन्न होते हैं। ऐसे लोग समाधान खोजने के बजाय दूसरों के अपमान और संकट में आनंद ढूँढते हैं।
विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है। इसमें शिव-धनुष टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वचनों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्यपूर्ण वचनों से देते हैं। दोनों के बीच होने वाला संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करता है। संवादों के माध्यम से ही कविता का कथात्मक विकास होता है और पात्रों के स्वभाव का निर्माण भी होता है।
संवादों की विशेषताएँ:
उत्तर: संवादों की विशेषताओं के उदाहरण
राम की विनम्रता
उदाहरण: “नाथ शंभु धनु भंजनिहारा। होइहि कोउ एक दास तुम्हारा॥”
स्पष्टीकरण: राम स्वयं को परशुराम का ‘दास’ कहकर अत्यंत विनम्रता प्रकट करते हैं।
परशुराम का रौद्र रूप
उदाहरण: “कहु जड़ जनक धनुष केहि तोरा। बेगि दिखाउ मोहि सो भूपा॥”
स्पष्टीकरण: यहाँ परशुराम का क्रोध, कठोर भाषा और आदेश देने का स्वर उनके रौद्र रूप को दर्शाता है।
लक्ष्मण का प्रत्युत्तर / व्यंग्य
उदाहरण: “बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहूँ न असि रिस कीन्ह गोसाईं॥”
स्पष्टीकरण: लक्ष्मण व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि बचपन में हमने कई धनुष तोड़े, तब तो आपने इतना क्रोध नहीं किया।
पौराणिक संदर्भ
उदाहरण: “सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु धरि फिरत धरनि अपारा॥”
स्पष्टीकरण: यहाँ परशुराम द्वारा सहस्रबाहु का वध करने का उल्लेख पौराणिक कथा का संदर्भ है।
नाटकीयता
उदाहरण: “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥”
स्पष्टीकरण: यह चेतावनी पूरी सभा में भय, तनाव और उत्सुकता उत्पन्न करती है, जिससे नाटकीयता बढ़ती है।
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों/मनःस्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है?
भाव: चिंता, क्रोध, व्यथा, भय, संयम/विनम्रता, ईर्ष्या/कुटिलता
| भाव / मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
| चिंता | “बिधि अब सँवरी बात बिगारी” | सीता की माता सुनयना | पुत्री के विवाह में बाधा और परशुराम के क्रोध से उत्पन्न आशंका |
| क्रोध | “अति रिस बोले बचन कठोरा” | मुनि परशुराम | शिव-धनुष के टूटने को अपने आराध्य का अपमान मानना |
| व्यथा | “अरध निमेष कलप सम बीता” | सीता जी | सभा की तनावपूर्ण स्थिति और परशुराम के क्रोध से मानसिक बेचैनी |
| भय | “उठे सकल भय बिकल भुआला” | सभा में उपस्थित राजा | परशुराम के भयानक रूप और क्रोधी स्वभाव को देखकर |
| संयम / विनम्रता | “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” | श्रीराम | परशुराम को शांत करने और मर्यादा बनाए रखने का प्रयास |
| ईर्ष्या / कुटिलता | “कुटिल भूप हरषे मन माहीं” | अन्य राजा | स्वयंवर में असफल होकर दूसरों को संकट में देखकर प्रसन्न होना |
“अति डर उतर देत नृपु नाहीं।” परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
1. संदर्भ: यह पंक्ति उस समय आती है जब परशुराम जी सभा में आकर अत्यंत क्रोध में पूछते हैं कि शिव-धनुष किसने तोड़ा है। इससे पहले श्रीराम विनम्रतापूर्वक उत्तर दे चुके थे और लक्ष्मण व्यंग्य कर रहे थे, जिससे परशुराम का क्रोध और बढ़ गया था।
2. कारण: शिव-धनुष का टूटना और परशुराम की चेतावनी कि “धनुष तोड़ने वाला समाज से अलग हो जाए, अन्यथा सभी राजा मारे जाएँगे” राजा जनक के मौन का मुख्य कारण था।
3. भाव: यहाँ जनक के मन में भय का भाव प्रबल था। वे एक पिता और राजा दोनों थे। उन्हें अपनी पुत्री सीता के भविष्य, अपनी प्रजा और सभा में उपस्थित राजाओं के प्राणों की चिंता थी।
4. परिणाम: परशुराम के कठोर वचन और उनके संहारक रूप को देखकर जनक जैसा विवेकशील राजा भी चुप हो गया। उनका मौन केवल डर नहीं था, बल्कि स्थिति की गंभीरता को समझते हुए लिया गया विवेकपूर्ण निर्णय भी था। उस समय क्रोधित मुनि को उत्तर देना आग में घी डालने जैसा हो सकता था।
निष्कर्ष: यह पंक्ति संकेत देती है कि जनक का मौन मुख्य रूप से भयजनित था, लेकिन यह उनकी दूरदर्शिता भी थी। उन्होंने अनावश्यक तर्क-वितर्क करने के बजाय शांत रहकर परशुराम के क्रोध को और अधिक भड़कने से रोका।
काव्य-पंक्ति और भाव
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसारा॥”
(क) इन पंक्तियों को बोलते समय आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर: इन पंक्तियों को बोलते समय चेहरे पर रौद्र यानी अत्यधिक क्रोध और गर्व का भाव होगा। ये शब्द परशुराम के हैं, इसलिए इनमें लक्ष्मण के प्रति तिरस्कार, अपनी शक्ति का अहंकार और शिव-धनुष टूटने पर उत्पन्न गहरा आक्रोश दिखाई देना चाहिए। आँखों में कठोरता और चेहरे पर क्रोध का भाव होना चाहिए।
(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे—
उत्तर:
परशुराम: रौद्र, क्रोध, अहंकार और शौर्य का भाव। वे शिव-धनुष टूटने पर अत्यंत क्रोधित हैं और अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं।
राजा जनक: भय, व्याकुलता और चिंता का भाव। वे परशुराम के क्रोध को देखकर चुप और चिंतित हो गए हैं।
लक्ष्मण: हास्य, व्यंग्य, निडरता और उत्साह का भाव। वे परशुराम की बातों का उत्तर मुसकराकर और तर्कपूर्ण व्यंग्य से देते हैं।
राम: शांत, विनम्र और धैर्यवान भाव। वे पूरी सभा में सबसे संतुलित पात्र हैं और अपने संयम से क्रोध को शांत करने का प्रयास करते हैं।
सभा में उपस्थित अन्य राजा: भय और कुटिलता का भाव। अधिकतर राजा डर रहे हैं, जबकि कुछ कुटिल राजा जनक और राम-लक्ष्मण को संकट में देखकर मन ही मन प्रसन्न हो रहे हैं।
विषयों से संवाद
1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा और धीर चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर: सभा में परशुराम के क्रोध के प्रति श्रीराम का व्यवहार उनकी विनम्रता, मर्यादा और धैर्य को दर्शाता है। ये गुण किसी भी अच्छे नेता या शासक के लिए आवश्यक होते हैं। हमें भी जीवन में कई परिस्थितियों में इन गुणों का परिचय देना पड़ता है।
2. कविता में वर्णित प्रसंग सीता-स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक आदि घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
उत्तर: कविता में सीता-स्वयंवर का प्रसंग है, जहाँ शिव-धनुष तोड़ने की शर्त रखी गई थी। इसी प्रकार महाभारत में द्रौपदी का स्वयंवर एक प्रसिद्ध उदाहरण है।
प्रसंग: पांचाल देश के राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के विवाह के लिए एक कठिन शर्त रखी थी।
शर्त: सभा के मध्य एक ऊँचा खंभा था। ऊपर घूमता हुआ चक्र और उस पर मछली रखी थी। नीचे तेल के पात्र में मछली का प्रतिबिंब देखकर धनुष से मछली की आँख भेदनी थी।
विवाह: सभा में उपस्थित अनेक राजा और राजकुमार इस शर्त को पूरा नहीं कर सके। अंत में ब्राह्मण वेश में उपस्थित अर्जुन ने अपने कौशल और एकाग्रता से मछली की आँख भेद दी। इसके बाद द्रौपदी ने अर्जुन को वरमाला पहनाई।
निष्कर्ष: यह प्रसंग बताता है कि प्राचीन काल में स्वयंवर केवल वर चुनने की विधि नहीं थी, बल्कि यह वीरता, कौशल और धैर्य की परीक्षा भी होती थी।
सृजन
1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
उत्तर: परशुराम के क्रोध को देखकर सीता जी के लिए एक-एक पल कल्प के समान भारी लग रहा था। उस क्षण सीता और उनकी माता सुनयना के बीच मौन संवाद इस प्रकार हो सकता है—
माता सुनयना: “पुत्री, विधाता ने तो बनी-बनाई बात बिगाड़ दी है। मुनि का यह भयंकर क्रोध और उनका फरसा देखकर मेरा हृदय काँप रहा है। क्या यह विवाह बिना किसी बाधा के पूरा हो पाएगा?”
सीता: “माँ, मेरी व्याकुलता भी शब्दों से परे है। मुनि के कठोर वचन सुनकर एक-एक पल युगों जैसा लंबा लग रहा है। मैं मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही हूँ कि वे मुनि का क्रोध शांत करें और रघुवीर की मर्यादा की रक्षा करें।”
2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।
(संकेत— लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
उत्तर: स्वयंवर की सभा में हो रहे संवादों को सुनकर सीता के मन में कई प्रकार के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे।
भय और चिंता: जब परशुराम ने शिव-धनुष टूटने पर कठोर वचन कहे और राजाओं को मारने की धमकी दी, तब सीता बहुत भयभीत हो गई होंगी। उन्हें डर रहा होगा कि कहीं यह विवाद किसी अनर्थ का कारण न बन जाए।
लक्ष्मण के प्रति शंका और हल्की मुस्कान: लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण वचनों को सुनकर सीता को एक ओर उनके साहस पर गर्व हुआ होगा, वहीं दूसरी ओर यह डर भी हुआ होगा कि कहीं इससे परशुराम का क्रोध और न बढ़ जाए।
राम के प्रति गर्व और भरोसा: श्रीराम के शांत और संतुलित उत्तर सुनकर सीता का मन उनके प्रति श्रद्धा और गर्व से भर गया होगा। उन्हें विश्वास हुआ होगा कि श्रीराम का धैर्य ही इस संकट को टाल सकता है।
निष्कर्ष: सीता के लिए यह समय परीक्षा की घड़ी था। एक ओर वे राम की विजय देखकर प्रसन्न थीं, तो दूसरी ओर परशुराम के क्रोध से उत्पन्न संकट ने उन्हें भयभीत कर दिया था।
3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर: यदि मुझे किसी सभा या महत्वपूर्ण अवसर पर अपना परिचय देना हो, तो मैं केवल अपना नाम बताने के बजाय अपने मूल्यों और व्यक्तित्व की विशेषताओं को बताना उचित समझूँगा।
निष्कर्ष: मेरा परिचय केवल मेरा नाम नहीं, बल्कि मेरे विचार, मूल्य और व्यवहार हैं, जो मुझे एक जिम्मेदार व्यक्ति बनाते हैं।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए—
यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है, जैसे— भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू।
उत्तर:
| विशेषता | अर्थ | उदाहरण |
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | “बोलि बानी बिचारि बहोरी॥” |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | “भूप सहस दस एकहि बारा॥” |
| रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | “कर कमल बंदउँ गुरु पद कंजा॥” |
बहुभाषिकता
यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है, जो हिंदी भाषा का ही एक रूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत-से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचानकर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए।
उत्तर: खड़ी बोली हिंदीगुजरातीमराठीपंजाबी
| अवधी शब्द | खड़ी बोली हिंदी | गुजराती | मराठी | पंजाबी |
| कोही | क्रोधी | ગુસ્સાવાળો | रागीट | ਗੁੱਸੇ ਵਾਲਾ |
| वेषु | वेश | વેશ | वेश | ਵੇਸ਼ |
| लोचन | आँख | આંખ | डोळे | ਅੱਖ |
| बेगि | जल्दी | જલદી | लवकर | ਜਲਦੀ |
| रिस | क्रोध | ગુસ્સો | राग | ਗੁੱਸਾ |
| बिधि | विधि / भगवान | ઈશ્વર | देव / विधाता | ਰੱਬ |
| बहोरि | फिर | ફરી | पुन्हा | ਫਿਰ |
| ढोटा | पुत्र | દીકરો | मुलगा | ਪੁੱਤਰ / ਮੁੰਡਾ |
| चितवहिं | देखना | જોવું | पाहणे | ਵੇਖਣਾ |
| आसिष | आशीर्वाद | આશીર્વાદ | आशीर्वाद | ਅਸੀਸ |
लोक में भाषा
नीचे दिए गए शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर:
| शब्द | लोकोक्ति | अर्थ | वाक्य में प्रयोग |
| मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। | आत्मविश्वास से सफलता मिलती है। | यदि तुम मन से प्रयास करोगे तो सफलता अवश्य मिलेगी, क्योंकि मन के जीते जीत है। |
| राम | राम नाम सत्य है। | जीवन नश्वर है, सत्य ही स्थायी है। | हमें सदैव अच्छे कर्म करने चाहिए, क्योंकि अंत में राम नाम सत्य है। |
| राजा | जैसा राजा वैसी प्रजा। | शासक के अनुसार ही प्रजा का व्यवहार होता है। | विद्यालय में प्रधानाचार्य के अनुशासन के कारण सभी विद्यार्थी नियम मानते हैं, जैसा राजा वैसी प्रजा। |
| बात | बात का बतंगड़ बनाना। | छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना। | उसने छोटी-सी गलती को लेकर बहुत झगड़ा किया, वह बात का बतंगड़ बना रहा था। |
| सिर | सिर पर चढ़ाना। | अधिक लाड़-प्यार देना। | बच्चे को इतना सिर पर मत चढ़ाओ, नहीं तो वह जिद्दी हो जाएगा। |
गद्य-रूप
नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए—
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥”
इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं।
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए—
“अति डर उतर देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”
उत्तर: मुनि परशुराम के अत्यंत भयानक क्रोध को देखकर राजा जनक बहुत डर गए। इसी कारण वे उनके प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे। उसी सभा में उपस्थित अन्य कुटिल राजा, जो स्वयंवर में असफल रहे थे, जनक को संकट में देखकर मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। वहाँ उपस्थित देवता, मुनि, नाग और नगर के स्त्री-पुरुष भी अत्यंत चिंतित हो उठे। सभी के हृदय में परशुराम के क्रोध का भारी भय समा गया।
मुख्य शब्दार्थ:
गतिविधियाँ
1. यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही का चिह्न लगाइए।
उत्तर:
| कथन | पात्र |
| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | राम |
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | सीता की माता सुनयना |
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | परशुराम |
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | जनक |
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | लक्ष्मण |
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | राम |
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | परशुराम |
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | लक्ष्मण |
2. रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: इस प्रसंग को मंच पर इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—
दृश्य: राजा जनक की भव्य सभा। बीच में टूटा हुआ शिव-धनुष रखा है। राजा और मुनि बैठे हैं। अचानक तीव्र गर्जना के साथ परशुराम का प्रवेश होता है।
वेशभूषा:
ध्वनि और संगीत:
अभिनय और भाव:
कठपुतली कला: कठपुतलियों के माध्यम से परशुराम का फरसा लहराना और राजाओं का डर से काँपना बहुत जीवंत प्रभाव पैदा करेगा।
3. ‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
उत्तर: ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ में लक्ष्मण का सत्य कहना साहस का प्रतीक है, यद्यपि परिस्थिति बहुत कठिन थी।
मेरे विचार:
निष्कर्ष: सत्य कहना साहस है, लेकिन सत्य को विवेक, धैर्य और मर्यादा के साथ कहना अधिक श्रेष्ठ है।
मेरी पहेली
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों— समाचार, धनुष, मन, नाग, नगर
उत्तर:
1. देश-दुनिया की खबर मैं लाता,
ज्ञान का सागर हूँ कहलाता।
स्वयंवर की सभा में मुनि को,
धनुष टूटने का संदेश सुनाता।
उत्तर: समाचार
2. शिव का हूँ मैं गहना भारी,
जिसे तोड़ खुश हुए पुरारी।
राम ने छुआ तो टूट गया,
परशुराम का क्रोध जाग उठा भारी।
उत्तर: धनुष
3. कभी दुखी तो कभी सुखी होता,
चंचल स्वभाव का मैं होता।
सीता के लिए पल युग-सा बीता,
जब इसमें चिंता का बीज था बोता।
उत्तर: मन
4. गले में शिव के माला बनकर रहता,
पाताल लोक का स्वामी कहलाता।
मुनि के डर से सभा में उपस्थित,
हर प्राणी जिसकी तरह था काँपता।
उत्तर: नाग
5. गलियाँ, चौबारे और ऊँची दीवारें,
जहाँ बसते हैं लोग सारे।
जनकपुर का वह हिस्सा हूँ मैं,
जहाँ धनुष टूटने पर डरे नर-नारी सारे।
उत्तर: नगर
Ram Lakshman Parshuram Samvad is a poetic dialogue from Ramcharitmanas by Tulsidas. The poem is based on the scene from Bal Kand, where Lord Shiva’s bow is broken during Sita’s swayamvar. After the bow breaks, Parshuram becomes extremely angry and enters King Janak’s court. The PDF explains that the poem creates drama through the dialogue between Parshuram and Lakshman, while also showing the calm and polite nature of Shri Ram.
In the assembly, Parshuram asks angrily who has broken Lord Shiva’s bow. Since he is a devotee of Shiva, he feels that the breaking of the bow is an insult to his deity. His anger frightens everyone present in the court. The kings become so afraid that they start introducing themselves along with their fathers’ names and bow down before him.
Shri Ram responds to Parshuram with great politeness and humility. He says that the person who broke the bow must be one of Parshuram’s servants. This shows Ram’s calm nature, discipline, and respect for elders. On the other hand, Lakshman replies to Parshuram with courage, humour, and sharp arguments. His words make Parshuram even more angry.
The situation becomes tense in the court. Sita and her mother are worried because Parshuram’s anger may create difficulty in the marriage ceremony. For Sita, even a short moment feels very long because she is anxious about the future.
The chapter highlights different emotions through different characters. Parshuram represents anger and pride, Lakshman represents courage and wit, Ram represents humility and self-control, Janak represents fear and concern, while the other kings show fear and jealousy. In the end, Ram’s calm and respectful behaviour helps control the tense situation.
Ram Lakshman Parshuram Samvad explains how different people react differently in the same situation. The main incident takes place after Shri Ram breaks the Shiva Dhanush in King Janak’s court. This incident makes Parshuram very angry because he considers Shiva’s bow sacred.
Parshuram’s anger shows his deep devotion towards Lord Shiva, but it also shows his pride and short temper. He speaks harshly and warns the entire assembly. His words create fear among the kings and make the whole court tense.
Shri Ram’s behaviour is completely different from Parshuram’s. Even though Parshuram is angry, Ram does not lose patience. He speaks politely and respectfully. His words show vinamrata, maryada, and dhairya. The PDF also explains that Ram’s humility is the right way to calm an angry person because it prevents the situation from becoming worse.
Lakshman’s behaviour shows bravery and fearlessness. He does not get scared of Parshuram’s anger. Instead, he replies with humour and sarcasm. His words are logical, but they also increase Parshuram’s anger. This contrast between Ram and Lakshman makes the poem dramatic and interesting.
The poem also presents the mental state of Sita and her mother. They are worried that Parshuram’s anger may create problems in the marriage. This shows the emotional side of the scene and makes the chapter more meaningful.
The main message of the chapter is that anger should be controlled with patience, politeness, and wisdom. Lakshman’s courage is admirable, but Ram’s calmness and respectful behaviour prove to be more effective. The chapter teaches students the importance of humility, courage, self-control, respect, and wise communication.
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राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद was written by Goswami Tulsidas. This poem has been taken from the Bal Kand of his famous epic Ramcharitmanas. It presents the powerful dialogue between Shri Ram, Lakshman, and Parshuram after the breaking of Shiva’s bow.
Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 explains the dialogue that takes place after Shri Ram breaks Lord Shiva’s bow during Sita’s swayamvar. Parashurama becomes very angry and questions the assembly, while Shri Ram answers him with politeness, calmness, and humility. Lakshmana, on the other hand, responds with courage, confidence, and humour.